सियासत की चादर
आज दिनांक 13 सितंबर 2022 को रात्रि 11 बजें लिखी कुछ पंक्तियां। मेरी इन पंक्तियों की आधारशिला इन पंक्तियों में है कि "कल तक जिन्हें बो कहते थे कुछ और,
आज बो उनको,कह रहे हैं कुछ और ?
वक्त को बदलते,देर नहीं लगती,
कल तक बो कुछ और थे,आज हैं कुछ और।
मेरी पंक्तियां आपके चरणों में समर्पित है और आपका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहे, यही अभिलाषा है।
सियासत की चादर है,
रंग तो बदलती है।
वक्त और परिस्थितियों की,
हवा तो बदलती है।
एक वक्त फिजाएं भी,
हवाओं का रुख बदलती थी।
अब वक्त की हवा ने,
फिजाओं का रुख बदल दिया।
एक वक्त माली ने,
फूलों को मसला था।
अब तारीफ करते फूलों की,
माली नहीं थकता।
अपनी ख़ुशी की खातिर,
जिनका कत्ल किया।
आज भरी महफिल में,
उन्हें याद करते हैं ?
जिन फूलों को खिलने से,
पहले ही मसल दिया।
हजारों थपेडें झेलकर,
खिलने लगे हैं वो।
सियासत कभी, कहीं भी,
एक ठौर ना रही ?
मिट्टी में दबा बीज,
अंकुर बन ही जाता है।
कब तक दबाओगे वक्त को,
ऐ सियासत के परिंदों ?
एक दिन सभी का वक्त,
बदल ही जाता है।
बहुत बहुत धन्यवाद और आभार
सुखराम कोली
9829950123
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